काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े कुछ अद्भुत रहस्य॥ काशी विश्वनाथ के 10 अनसुने रहस्य

Sourav Pradhan
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बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग काशी में है जिसे बाबा विश्वनाथ कहते हैं। काशी को बनारस और वाराणसी भी कहते हैं। शिव और काल भैरव की यह नगरी अद्भुत है जिसे सप्तपुरियों में शामिल किया गया है। दो नदियों 'वरुणा' और 'असि' के मध्य बसे होने के कारण इसका नाम 'वाराणसी' पड़ा।


 काशी की उत्पत्ति कैसे हुई? ( Kashi ki utpatti kaise hui? )
ऋग्वेद में काशी का वर्णन इस प्रकार मिलता है – ‘काशिरित्ते.. आप इवकाशिनासंगृभीता:’। पुराणों के मुताबिक पहले यह भगवान विष्णु की पुरी हुआ करती थी। परन्तु भगवान शिव ने विष्णु जी से यह अपने निवास के लिए मांग लिया था। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। एक बार जब भगवान शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्माजी का पांचवां सिर धड़ से अलग कर दिया तो वह सिर उनके करतल से चिपक गया। कहा जाता है कि करीब बारह वर्षों तक भगवान शिव अनेक तीर्थों का भ्रमण करते रहे परन्तु वह उनके करतल ने अलग न हुआ।
 इसके बाद भ्रमण करने के दौरान जैसे ही उन्होंने काशी में कदम रखा ब्रह्महत्या का यह दोष खत्म हो गया क्योंकि वह सिर उनके करतल से अलग हो गया। इस घटना के बाद से ही भगवान शिव को काशी अत्यधिक भाने लगी और उन्होंने इसे भगवान विष्णु से इसे अपने रहने के लिए मांग लिया। जिस स्थान पर वह सिर शिव के करतल से अलग हुआ था वह स्थान कपालमोचन-तीर्थ कहलाया।

काशी विश्वनाथ की कहानी क्या है? ( Kashi Vishwanath ki kahani kya hai? )
काशी विश्वनाथ को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है। एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच अपने आप को सर्वोच्च साबित करने की जंग छिड़ गई। दोनों ही अपने आप को शक्तिशाली साबित करने में लगे हुए थे। इस जंग को समाप्त करने के लिए भगवान शिव ने एक विशाल ज्योतिर्लिंग का रूप धारण कर लिया।  

इसके बाद शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को इसके स्त्रोत और ऊंचाई का पता लगाने के लिए कहा। उस ज्योतिर्लिंग का पता लगाने के लिए भगवान विष्णु ने शूकर का रूप धारण किया और जमीन के नीचे खुदाई में जुट गए जबकि ब्रह्मा जी हंस पर बैठकर आकाश की तरफ गए। लेकिन दोनों ही इसके स्त्रोत और ऊंचाई का पता लगाने में असमर्थ रहे।

थक-हारकर विष्णु ने शिव जी के सामने हाथ जोड़ लिए और कहा कि वे इसका पता लगाने में असमर्थ रहे। वहीँ दूसरी तरफ ब्रह्मा जी ने झूठ बोला और कहा कि इसकी ऊंचाई उन्हें पता है। इस बात पर भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित हुए और उन्होंने ब्रह्मा जी श्राप दिया। श्राप यह कि आज के बाद ब्रह्मा जी की पूजा नहीं की जाएगी।     

काशी में कितने शिवलिंग है? ( Kashi me kitne Shivling hai? )
काशी में 12 ज्योतिर्लिंगों के समान माने जाने वाले 12 मंदिर मौजूद हैं। इन मंदिरों में सोमनाथ महादेव मंदिर, ओंकारेश्वर महादेव मंदिर, मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर, महाकालेश्वर महादेव मंदिर, बैजनाथ महादेव मंदिर, भीमाशंकर महादेव मंदिर, रामेश्वर महादेव मंदिर, नागेश्वर महादेव मंदिर, श्री काशी विश्वनाथ नाथ मंदिर, घृणेश्वर महादेव मंदिर, केदार जी और त्र्यंबकेश्वर महादेव मंदिर शामिल है।


काशी में कौन-कौन से मंदिर है? ( Kashi me kaun-kaun se Mandir hai? )
काशी के प्रमुख मंदिरों की सूची इस प्रकार है :

1. श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

2. मृत्युंजय महादेव मन्दिर

3. माँ अन्नपूर्णा मन्दिर

4. विश्वनाथ मन्दिर बी एच यू

5. संकठा मन्दिर

6. तुलसी मानस मन्दिर

7. कालभैरव मन्दिर

8. भारत माता मन्दिर

9. दुर्गा मन्दिर

10. संकटमोचन मन्दिर

काशी के अलावा कौन सी चीजें भगवान शिव को अत्यधिक प्रिय हैं?
जिस प्रकार काशी भगवान शिव से संबंधित एक पवित्र स्थल माना जाता है, उसी प्रकार नर्मदेश्वर शिवलिंग भी शिव की सबसे प्रिय वस्तु मानी जाती है। शिव के इस प्रिय शिवलिंग को प्राण-प्रतिष्ठा की भी नहीं होती है।

काशी विश्वनाथ के 10 अनसुने रहस्य ः

1. त्रिशुल की नोक कर बसी है काशी : पुरी में जगन्नाथ है तो काशी में विश्वनाथ। भगवान शिव के त्रिशुल की नोक पर बसी है शिव की नगरी काशी।
 
2. भगवान शिव की सबसे प्रिय नगरी : भगवान शंकर को यह गद्दी अत्यन्त प्रिय है इसीलिए उन्होंने इसे अपनी राजधानी एवं अपना नाम काशीनाथ रखा है।

 
3. विष्णु की तभोभूमि : विष्णु ने अपने चिन्तन से यहां एक पुष्कर्णी का निर्माण किया और लगभग पचास हजार वर्षों तक वे यहां घोर तपस्या करते रहे। 
 
4. सदाशिव ने की उत्पत्ति काशी की : शिवपुराण अनुसार उस कालरूपी ब्रह्म सदाशिव ने एक ही समय शक्ति के साथ 'शिवलोक' नामक क्षेत्र का निर्माण किया था। उस उत्तम क्षेत्र को 'काशी' कहते हैं। यहां शक्ति और शिव अर्थात कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और दुर्गा यहां पति और पत्नी के रूप में निवास करते हैं।

 

5. ब्रह्मा विष्णु और महेष की उत्पत्ति : कहते हैं कि यहीं पर सदाशिव से पहले विष्णु, फिर ब्रह्मा, रुद्र और महेष की उत्पत्ति हुई। 
 
6. काशी में मिलता है मोक्ष : ऐसी मान्यता है कि वाराणसी या काशी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्तिदायक तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। इसीलिए अधिकतर लोग यहां काशी में अपने जीवन का अंतिम वक्त बीताने के लिए आते हैं और मरने तक यहीं रहते हैं। इसके काशी में पर्याप्त व्यव्था की गई है। यह शहर सप्तमोक्षदायिनी नगरी में एक है।

 
7. उत्तरकाशी भी काशी : उत्तरकाशी को भी छोटा काशी कहा जाता है। ऋषिकेश उत्तरकाशी जिले का मुख्य स्थान है। उत्तरकाशी जिले का एक भाग बड़कोट एक समय पर गढ़वाल राज्य का हिस्सा था। बड़कोट आज उत्तरकाशी का काफी महत्वपूर्ण शहर है। उत्तरकाशी की भूमि सदियों से भारतीय साधु-संतों के लिए आध्यात्मिक अनुभूति की और तपस्या स्थली रही है। महाभारत के अनुसार उत्तरकाशी में ही एक महान साधु जड़ भारत ने यहां घोर तपस्या की थी। स्कंद पुराण के केदारखंड में उत्तरकाशी और भागीरथी, जाह्नवी व भीलगंगा के बारे में वर्णन है।
 
8. ज्योतिर्लिंग : द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। ह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक 'तीर्थ चिंतामणि' में वर्णन किया है कि अविमुक्तेश्वर और विशेश्वर एक ही शिवलिंग है।

 
9. विष्णु की पुरी : पुराणों के अनुसार पहले यह भगवान विष्णु की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदु सरोवर बन गया और प्रभु यहां 'बिंधुमाधव' के नाम से प्रतिष्ठित हुए। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास स्थान बन गई।
 
10. धनुषाकारी है यह नगरी : पतित पावनी भागीरथी गंगा के तट पर धनुषाकारी बसी हुई है जो पाप-नाशिनी है।

11.ध्वस्थ कर दिया था यहां का मंदिर
चीनी यात्री (ह्वेनसांग) के अनुसार उसके समय में काशी में सौ मंदिर थे, किन्तु मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सभी मंदिर ध्वस्त कर मस्जिदों का निर्माण किया। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।
 

 
डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।
 

 
12.काशी के कोतवाल
भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। काशी विश्‍वनाथ में दर्शन से पहले भैरव के दर्शन करना होते हैं तभी दर्शन का महत्व माना जाता है। उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्‍यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव। 
 
13.काशी में मिलता है मोक्ष
ऐसी मान्यता है कि वाराणसी या काशी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्तिदायक तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। इसीलिए अधिकतर लोग यहां काशी में अपने जीवन का अंतिम वक्त बीताने के लिए आते हैं और मरने तक यहीं रहते हैं। इसके काशी में पर्याप्त व्यव्था की गई है। वाराणसी कई शताब्दियों से हिन्दू मोक्ष तीर्थस्थल माना जाता है। शास्त्र मतानुसार जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो मोक्ष हेतु मृतक की अस्थियां यहीं पर गंगा में विसर्जित की जाती हैं। यह शहर सप्तमोक्षदायिनी नगरी में एक है। 

14.भारत का सबसे प्राचीन शहर काशी
इजिप्ट (मिस्र), बगदाद, देहरान, मक्का, रोम, एथेंस, येरुशलम, बाइब्लोस, जेरिको, मोहन-जोदड़ो, हड़प्पा, लोनान, मोसुल आदि नगरों की दुनिया के प्राचीन नगरों में गिनती की जाती है, लेकिन पौराणिक और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार दुनिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी है। दुनिया न भी माने, तो यह भारत का सबसे प्राचीन शहर है।
 
 
शहरों और नगरों में बसाहट के अब तक प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर एशिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी को ही माना जाता है। इसमें लोगों के निवास के प्रमाण 3,000 साल से अधिक पुराने हैं। हालांकि कुछ विद्वान इसे करीब 5,000 साल पुराना मानते हैं, लेकिन हिन्दू धर्मग्रंथों में मिलने वाले उल्लेख के अनुसार यह और भी पुराना शहर है। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है। इसका उल्लेख उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।
 
 
15.महात्मा और संतों की नगरी
भगवान बुद्ध ने बोध गया में ज्ञान प्राप्त कर यहीं पर अपना पहला प्रवचन दिया और जैनियों के तीन तीर्थंकरो का जन्म यहीं हुआ इसीलिए यह तीनों धर्मों के लिए पवित्र स्थल है। कबीर ने यहीं पर बैठकर अपने संदेश को दु‍निया में फैलाया। तुलसीदास जी ने यहीं बैठकर रामचरित मानस की रचना की। इस तरह काशी कई महात्मा और संतों की पुण्य स्थली है।

 
भगवान बुद्ध और शंकराचार्य के अलावा रामानुज, वल्लभाचार्य, संत कबीर, गुरु नानक, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, रैदास आदि अनेक संत इस नगरी में आए। एक काल में यह हिन्दू धर्म का प्रमुख सत्संग और शास्त्रार्थ का स्थान बन गया था। संस्कृत पढ़ने के लिए प्राचीनकाल से ही लोग वाराणसी आया करते थे।
 
 
16.संगीत घरानों की नगरी
वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी संगीत में अपनी ही शैली है। सन् 1194 में शहाबुद्दीन गौरी ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुंचाई। मुगलकाल में इसका नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया।
 

17.बनारसी पान, बाबू और साड़ी दुनिया में प्रसिद्ध
काशी को बनारस भी कहते हैं। यहां का बनारसी पान, बनारसी सिल्क साड़ी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संपूर्ण भारत में ही नहीं, विदेश में भी अपनी प्रसिद्धि के लिए ‍चर्चित है। यहां के लोग भी अद्भुत होते हैं, जिन्हें बनारसी बाबू कहते हैं। इनका व्यवहार बहुत मीठा और ज्ञानपूर्ण होता है। दिमाग से तेज होते हैं बनारसी बाबू। देखा जाए तो काशी बहुत बड़े नेता, अभिनेता, गायक, संगीतकार, नृत्यकार और कलाकारों की नगरी है।
 
18. उत्तरकाशी भी काशी
उत्तरकाशी को भी छोटा काशी कहा जाता है। ऋषिकेश उत्तरकाशी जिले का मुख्य स्थान है। उत्तरकाशी जिले का एक भाग बड़कोट एक समय पर गढ़वाल राज्य का हिस्सा था। बड़कोट आज उत्तरकाशी का काफी महत्वपूर्ण शहर है। उत्तरकाशी की भूमि सदियों से भारतीय साधु-संतों के लिए आध्यात्मिक अनुभूति की और तपस्या स्थली रही है। दुनियाभर से लोग यहां वैदिक भाषा सीखने के लिए आते रहे हैं। महाभारत के अनुसार उत्तरकाशी में ही एक महान साधु जड़ भारत ने यहां घोर तपस्या की थी। स्कंद पुराण के केदारखंड में उत्तरकाशी और भागीरथी, जाह्नवी व भीलगंगा के बारे में वर्णन है।

FAQs

काशी में कुल कितने घाट है?
काशी में कुल 88 घाट हैं इन घाटों में 86 घाटों पर पूजा और समारोह का आयोजन किया जाता है जबकि 2 घाटों का प्रयोग शमशान भूमि के लिए किया जाता है।
  
काशी में कितने वर्ष रह कर तुलसीदास ने विद्या अध्ययन किया?
काशी में तुसलीदास जी ने शेषसनातन जी के साथ रहकर करीब पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन कर ज्ञान अर्जित किया।

बनारस का पुराना नाम क्या है?
बनारस प्राचीन समय में काशी के नाम से विख्यात था। इस नगरी की सबसे ख़ास बात यह है कि इसे संसार की सबसे प्राचीन नगरी में से एक माना जाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर को किसने बनवाया था?
12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल काशी विश्वनाथ मंदिर को महरानी अहिल्या बाई होल्कर ने सन 1780 में बनवाया था। इसके बाद महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 किलो शुद्ध सोने का प्रयोग कर इसे निर्मित करवाया था।

काशी नरेश का क्या नाम था?
डॉ॰ विभूति नारायण सिंह भारत की आज़ादी से पहले के आखिरी नरेश थे।  

काशी नरेश की कितनी पुत्रियां थी और उनका क्या नाम था?
काशी नरेश डॉ॰ विभूति नारायण सिंह का एक पुत्र कुंवर अनंत नारायण सिंह और तीन पुत्रियां विष्णु प्रिया, हरि प्रिया एवं कृष्ण प्रिया हैं।

काशी नगरी क्यों प्रसिद्ध है?
काशी नगरी को मोक्ष प्राप्ति का द्वार माना जाता है। मान्यता है कि जिन लोगों को श्री हरि के दर्शन प्राप्त नहीं होते वे काशी की ओर रुख करते हैं। इस संबंध में कहावत भी लोकप्रिय है : ‘सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिन लेहुँ करवट कासी’।

बनारस में सबसे प्रसिद्ध मंदिर कौन सा हे?
बनारस का सबसे प्रसिद्ध मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल काशी विश्वनाथ मंदिर है जहाँ हर रोज़ हज़ारों की संख्या में लोग दर्शन करने के लिए आते हैं।  

काशी विश्वनाथ मंदिर का क्या महत्व है?
काशी का हिन्दू धर्म में बहुत पवित्र स्थान है। काशी मोक्ष प्राप्ति का द्वार माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह नगरी भगवान शिव के त्रिशूल की नोक पर विराजमान है।  

काशी विश्वनाथ मंदिर कब तोड़ा गया?
18 अप्रैल सन 1669 को मुग़ल शासक औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था।
 
काशी में कौन सी नदी है?
काशी में पांच नदियों का संगम गंगा घाट पर होता है इन नदियों में गंगा ,जमुना ,सरस्वती ,किरणा और धूतपापा शामिल है।  
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