The REAL Difference Between Valmiki Ramayan and TV Scenes

प्रत्येक जीव का धर्म देश काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है जहां देश की सीमा पर तैनात एक सैनिक का धर्म देश रक्षा होता है। वहीं जब वह सैनिक घर लौटकर अपने पत्नी और बच्चों के पास आता है तो उसे पिता और पति धर्म का निर्वाहन करना होता है। तो सनातन परंपरा में धर्म सिंपल होते हुए भी एक कॉम्प्लेक्स स्ट्रक्चर रहा है और इसी आधार पर कई सारे धर्म ग्रंथों और महाकाव्यों की रचना की जो हमें जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर धर्म का निर्वाह करना सिखाते हैं और चूंकि धर्म का स्वरूप काल पर भी निर्भर करता है इसलिए यह कथाएं समाज के साथ ढलती जाती हैं पर इससे कई नई कथाएं और नई रीति यां जन्म लेती हैं। कई ऐसी बातें प्रचलन में आ जाती हैं जो मूल ग्रंथों में थी ही नहीं इनमें से अधिकतर कथाएं हम तक मुख्यता टीवी सीरियल्स और फिल्म्स के माध्यम से पहुंची हैं जिनका क्या सोर्स रहा है यह हमको नहीं पता होता। देखा जाए तो आज भारतवर्ष में 300 से भी ज्यादा रामायण प्रचलन में है लेकिन ये जो सींस हमने देखे हैं टीवी सीरियल्स में ये किस रामायण से आए हैं इसके विषय में हमको बहुत कम पता होता है 


आज हम टीवी सीरियल्स में दिखाई गई रामायण और वाल्मीक रामायण में कंपैरिजन करते हुए बहुत से ऐसे फैक्ट्स और बातें जानेंगे जिनके विषय में शायद आपको नहीं पता होगा इनमें से कुछ कथाएं कुछ बातें तो आज हमारे समाज का ऐसा अभिन्न हिस्सा है कि इनका रामायण में ना होना असंभव सा लगता है तो दोस्तों बिना किसी विलम्केब के आइए इन कथाओं के विषय में जानते हैं।

दोस्तों अगर हम बालकांड से प्रारंभ करें तो बालकांड में सबसे आइकॉनिक सीन रहा है माता सीता का स्वयंवर हमने फिल्म्स में टीवी सीरियल्स में बहुत ही त्यौहार के जैसा एक भव्य समारोह देखा है जिसमें देश विदेश के राजकुमार और राजा इकट्ठा होते हैं शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए जिससे उनका माता सीता से विवाह हो सके ये जो सीन दिखाया जाता है यह बहुत ही भव्य दिखाया जाता है और एक समारोह त्यौहार के सदृश्य दिखता है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि वाल्मीकि रामायण में इस तरह का कोई भी भव्य समारोह राजा जनक ने सीता जी के लिए नहीं करवाया था स्वयंवर अवश्य हुआ था लेकिन प्रक्रिया कुछ और थी अगर आप वाल्मीकि रामायण में देखें तो बालकांड के 66वें सर्ग में हमें श्री राम जी और सीता जी की कथा का वर्णन मिलता है हम सभी को पता है कि विश्वामित्र जी जब श्री राम जी और लक्ष्मण जी को राजा दशरत जी के पास से लेकर आए थे तो वे दोनों राजकुमारों को सीता जी के स्वयंवर में ले गए थे लेकिन वाल्मीकि रामायण में अगर आप देखेंगे तो दोनों राजकुमार मिथिला नगरी जरूर गए थे राजा जनक की जो नगरी थी लेकिन वो स्वयंवर में नहीं गए थे जब वहां पर वो मिलते हैं विश्वामित्र जी राजा जनक से तब राजा जनक इस बात के विषय में बताते हैं कि उन्होंने अपनी पुत्री को "वीर्य शुल्का" घोषित कर दिया है अब यह वीर शुल्का क्या है तो "जब भी कोई बालिका को वीर शुल्का घोषित किया जाता था तब उसका अर्थ यह होता था कि अगर कोई पुरुष आएगा और उचित रूप से अपना पराक्रम प्रकट करेगा तब उस बालिका का विवाह उस पुरुष से हो जाएगा" तो वाल्मीकि रामायण में राजा जनक जी ने सीता जी को वीर शुल्का घोषित कर दिया था और उसके बाद से जैसे-जैसे ये खबर पहुंचती गई तो धीरे-धीरे कुछ ना कुछ राजा और राजकुमार राजा जनक के पास विजिट करते थे और कई राजाओं और राजकुमारों ने शिवधनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया और असफल हुए तो इस प्रकार का कोई भव्य समारोह नहीं हुआ था जहां पर बहुत ढेर सारे राजा लोग इकट्ठा होकर शिवधनुष पर प्रत्यंचा जिन्होंने चढ़ाई हो जैसा कि हमने देखा है इसके उल्टा यहां तक ये हो गया था कि जो राजा असफल हो गए थे उन्होंने सब मिलकर राजा जनक पर मिथिला नगरी पर आक्रमण तक कर दिया था और इसके लिए राजा जनक को बहुत से युद्ध लड़ने भी पड़े थे ये चीजें धीरे-धीरे हो रही थी। और इसके बाद इसी प्रकरण में श्री राम जी विश्वामित्र जी के साथ राजा जनक के पास पहुंचते हैं और जब राजा जनक इस विषय में बताते हैं तब श्री राम जी ने विश्वामित्र जी की आज्ञा से उस धनुष पर शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई थी और प्रत्यंचा चढ़ाते हुए शिवधनुष को तोड़ दिया था जिसके बाद फिर उनका विवाह राजा जनक जी ने अपनी पुत्री का जो हाथ है श्री राम जी के हाथ में दे दिया था तो कुछ इस प्रकार से यह घटना घटती है।

वाल्मीकि रामायण में लेकिन हमें टीवी सीरियल्स में इस तरह से दिखाया जाता है कि एक जगह पर सभी राजा लोग इकट्ठा होकर इस स्वयंबर में पार्टिसिपेट किए थे लेकिन अब ये आई कहां से यह बात टीवी सीरियल्स को क्या सोर्स मिला है तो ये सोर्स आता है श्री राम चरित मानस से इस पूरे प्रकरण को और भी रसपूर्ण बनाने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक स्वयंवर के भव्य समारोह की रचना की थी जिससे पाठक को और भी रसपूर्ण तरीके से ये पूरा प्रकरण समझ में आए तो टीवी सीरियल्स में दिखाया गया ये सीन रामचरितमानस से आता है वाल्मीक रामायण में इस तरह का कोई सीन नहीं दिया गया है 


दोस्तों इसके साथ एक और बात जुड़ी हुई है हम सभी को पता है कि माता सीता ने बचपन में ही शिव धनुष को अपने हाथ से उठा लिया था लेकिन ये जो बात हमें पता है ये ना हमें वाल्मीकि रामायण में देखने को मिलती है और ना ही रामचरित मानस में यह बात कहां से आई है अगर आपको पता है तो हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा दोस्तों अब आइए ऐसे और भी प्रसंग देखते हैं जो वाल्मीकि रामायण में तो नहीं दिए गए हैं लेकिन हमारे मन में बस चुके हैं।


साथियों जब श्री राम जी लक्ष्मण जी के साथ और माता सीता जी के साथ वन में जीवन व्यतीत कर रहे थे तो उस समय एक प्रकरण आता है मारीच वध का जो कि बहुत ही लोकप्रिय है हम सभी को पता है जब श्री राम जी मृग रूपी राक्षस मारीच का वध करते हैं तो मारी जी श्री राम जी की आवाज में चिल्लाने लगता है जिसको सुनकर माता सीता जी व्याकुल हो जाती हैं और लक्ष्मण जी से कहती हैं कि जाइए अपने भाई की रक्षा कीजिए अब यहां पर लक्ष्मण जी धर्म संकट में आ जाते हैं क्योंकि श्री राम जी ने उनको दायित्व सौंपा था कि वो वहीं पर रहकर सीता माता की रक्षा करें लेकिन जब सीता माता जी की वो फटकार सुनते हैं तो सीता माता जी को एक लक्ष्मण रेखा के भीतर सुरक्षित करके वो श्री राम जी को बचाने के लिए जाते हैं अब आपको यह बात जानकर हैरानी होगी कि इस तरह की कोई लक्ष्मण रेखा वाल्मीकि रामायण में नहीं बताई गई है अगर आप वाल्मीकि रामायण को देखें तो अरण्यकांड के 45 वें सर्ग में इस घटना का विवरण है लेकिन वाल्मीकि रामायण में माता सीता के कटु वचनों को सुनने के बाद लक्ष्मण जी अपने मन को वश में करते हैं और श्री राम जी की रक्षा करने के लिए चले जाते हैं यहां पर लक्ष्मण रेखा का कोई भी विवरण नहीं दिया गया है। और अगर आपको लगता है कि यह बात श्री राम शरत मानस में दी गई होगी तो मानस में भी अरण्यकांड में सीता हरण प्रकरण में लक्ष्मण रेखा के विषय में कुछ भी बताया नहीं गया है लेकिन अब ये आई बात कहां से कैसे टीवी सीरियल्स और फिल्म्स में दिखाया गया है तो हमने जब रिसर्च की तो श्री रामचरित मानस में ही लंका कांड में मंदोदरी के मुख से लक्ष्मण रेखा के विषय में वर्णन मिलता है। श्री रामचरित मानस के लंका कांड में जब मंदोदरी जी रावण को समझाती हैं कि आप श्री राम जी से युद्ध मत कीजिए तो वहां पर वो एक चौपाई में कहती हैं कि जब आप उनके छोटे भाई लक्ष्मण जी द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को नहीं लांग पाए तो आप किस प्रकार से श्री राम जी से युद्ध जीतेंगे। तो यहां पर लंका कांड में हमें एक वर्णन देखने को मिलता है लक्ष्मण रेखा के ऊपर लेकिन ना तो वाल्मीकि रामायण के अरण्य कांड में या फिर श्री रामचरित मानस जी के अरण्य कांड में जहां पर सीता जी का हरण हुआ वहां पर लक्ष्मण रेखा का कोई भी विवरण नहीं मिलता है

दोस्तों ऐसी एक और कथा है जो हमारे मन में बसी हुई है शबरी जी की कथा शबरी जी के जूठे बेरों की कथा आइए इस कथा के भी विषय में जानते हैं कि इसका सोर्स क्या रहा है।


साथियों शबरी माई के झूठे बेरों की कथा बहुत ही ज्यादा प्रचलित है और हमारे अंतरमन को भाव विभोर कर देती है हमने इस कथा को इतना चाहा है कि भजन आदि के रूपों में भी हमने इसको सजो के रखा है हमने टीवी सीरियल्स में भी देखा है कि जब जब श्री राम जी लक्ष्मण जी के साथ शबरी माई की कुटिया में पधार हैं तो शबरी माई एक-एक बेर को चक चक कर श्री राम जी को देती हैं जिससे कि उनको कोई भी बेर खट्टा ना मिले और श्री राम जी जानते हुए कि ये झूठे बेर हैं फिर भी बहुत ही चाव से खाते हैं ये दृश्य भाव विभोर कर देने वाले हैं। लेकिन आपको ये बात जानकर हैरानी होगी कि वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार का कोई झूठे बेरों का दृश्य नहीं बताया गया है। ये प्रसंग वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के 74 वें सर्ग में आता है लेकिन वहां पर जरूर शबरी जी श्री राम जी और लक्ष्मण जी का स्वागत करती हैं। बहुत ढेर सारे कंदमूल फलफूल आदि को उनके समक्ष प्रस्तुत करती हैं लेकिन कहीं भी झूठे बेरों को श्री राम जी को नहीं खिलाती हैं। तो यह कथा आखिर आई कहां से और किस प्रकार से टीवी सीरियल में हमें दिखाई जाती है इसको हमें देखना चाहिए दोस्तों हमने रिसर्च की और देखा कि श्री रामचरित मानस में भी इस प्रकार का कोई प्रकरण नहीं है शबरी जी श्री राम जी और लक्ष्मण जी का स्वागत जरूर करती हैं कंदमूल फल आदि भी प्रस्तुत करती हैं लेकिन झूठे बेर श्री रामचरित मानस में भी नहीं खिलाई हैं साथियों जो कथा है श्री राम जी की और शबरी जी की यह जातिभेद के विरुद्ध हमें सीख देती है और जब हमने रिसर्च की तो हमें पता चला कि यह कथा "पद्म पुराण" से और "उड़िया रामायण" से ली गई है तो हम देख सकते हैं कि किस प्रकार से वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस में तो यह कथा नहीं है। लेकिन चूंकि यह कथा इतनी ज्यादा सीख देने वाली है और हमारे अंतर मन को छू लेती है तो हमने ओड़िया रामायण से और पद्म पुराण से इस कथा को जीवंत कर दिया है और अपने हृदय पटल में उतार लिया है 


साथियों इससे पहले हम आगे बढ़े और ऐसी एक और कथा को जाने जो कि वाल्मीकि रामायण में नहीं दी गई है लेकिन हमारे समाज में हमारे घर परिवार में बहुत ज्यादा प्रचलित है। साथियों अब एक और आइकॉनिक सीन है हनुमान जी का जो हमारे मन में बसता है उनका सीना चीरना आइए इस कथा के भी बारे में जानते हैं।


दोस्तों हनुमान जी का सीना चिरना तो हमारे दिल दिमाग और आंखों में बसा हुआ है हम सबके घरों में हनुमान जी की ये इमेज जरूर देखने को मिल जाएगी और इसके पीछे की कथा इतनी प्रचलित है कि इस कथा के बिना रामायण के की कल्पना करना भी असंभव सा लगता है हम सबको पता है कि एक बार सीता जी ने एक मोती की माला को हनुमान जी को उपहार स्वरूप दिया था और हनुमान जी ने उस मोती की माला को बड़े गौर से देखा और उसके बाद उसको तोड़कर फेंक दिया था और इस पर जब सीता जी ने पूछा था कि आप इन मोतियों की माला को क्यों तोड़कर फेंक दे रहे हैं तो हनुमान जी ने कहा था कि इन मोतियों में श्री राम जी की छवि नहीं है इसलिए ये उनके किसी काम की नहीं है और इस पर वहां पर जो सभा में उपस्थित और भी लोग रहते हैं वो हनुमान जी का मजाक उड़ाते हैं और उनसे बोलते हैं कि क्या तुम्हारे अंदर भी श्री राम जी हैं अगर नहीं है तो तुम इस शरीर को भी त्याग दो और इस बात को सुनकर हनुमान जी ने फिर अपना सीना चीर के दिखा दिया था जब उन्होंने सीना चीरा था तो उसमें श्री राम जी लक्ष्मण जी और सीता जी की छवि दिखाई दी थी ये हनुमान जी की भक्ति का सर्वोच्च नमूना है लेकिन अगर आप इस प्रसंग को वाल्मीकि रामायण में ढूंढने जाएंगे तो आपको नहीं मिलेगा वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के 128 वें सर्ग में इस कथा का उल्लेख मिलता है और यहां पर सीता जी हनुमान जी को एक मोती की माला देती हैं जिसको सप्रेम हनुमान जी अपने पास रख लेते हैं तो वाल्मीकि रामायण में कहीं पर भी इस प्रकार का कोई दृश्य नहीं है अगर आप श्री रामचरित मानस को भी देखें तो वहां पर भी यह प्रकरण नहीं दिया गया है। तो फिर साथियों हमने रिसर्च की और पता लगाने का प्रयास किया कि यह कथा कहां से आई है तो हमें पता चला कि यह कथा रामायण के "बंगला संस्करण" जिसे "कृति बासी रामायण" भी कहते हैं वहां से लिया गया है ये कृति बासी रामायण 15वीं शती के आसपास लिखी गई थी तो दोस्तों हम देख सकते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति कितनी डावर्स है कि हमारी एक पावन कथा है रामायण उसको हर एक कालखंड में देश के अलग-अलग कोनों में कई कवियों ने सैकड़ों बार बुना है और हर बार कुछ ऐसा प्रसंग लिखा है जिसने ना केवल उनके छोटे से क्षेत्र में बल्कि पूरे भारतवर्ष में सबके दिलों में जगह बनाई है। साथियों इस आर्टिकल का उद्देश्य किसी भी चीज को डिनायर है बल्कि केवल यह समझाना था कि वाल्मीकि रामायण के भी अलावा बहुत ढेर सारे ऐसे ग्रंथ हैं जिन्होंने श्री राम जी के और उनकी कथा के माध्यम से हमारे पूरे समाज को बांध के रखा है। 

और यह बात यह भी प्रदर्शित करता है कि किस प्रकार से हिंदू सनातन धर्म एक रूढ़िवादी फिक्स धर्म नहीं है कि आप अपने आप को किसी एक किताब से बांध ले और आपको सब कुछ दिखना बंद हो जाए। इसीलिए यहां पर एक पावन कथा जो है उसकी बार-बार रीटेलिंग्स की गई है और हर एक रिटेलिंग को उतना ही सम्मान दिया गया है ऐसे में कई भाइयों बहनों को यह भी लग सकता है कि रामायण को एक काल्पनिक कथा रही होगी जो जगह-जगह पर जाकर लोगों ने अलग-अलग तरह से बताई है तो रामायण कितनी ऑथेंटिक है इस पर भी हम एक आर्अटिकल वश्य लाएंगे अगर आपको ऐसी एक आर्टिकल चाहिए तो हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं हम इसको एक थॉट एक्सपेरिमेंट की तरह करेंगे इसके लिए हमें कहीं बहुत बड़े-बड़े फैक्ट्स नहीं चाहिए एक रूम में ही बैठकर हम यह पता लगा सकते हैं कि रामायण सच है या नहीं है दोस्तों इसी के साथ आप सभी के उपर भगवान श्री राम जि कृपा बनाए रखें।

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